अटल मंथन
दाल में काला,कहीं और होगा
उम्मीद तो नहीं,यहां भी है धोखा !
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पतंजलि के सम्मुख,कोई न टिक रहा
बेचना भी चाहे तो,कुछ भी न बिक रहा !
विज्ञापनों की माया,ही कुछ ऐसी है
राम जी के अतिरिक्त,कोई ना दिखाई दे !
विदेशी कम्पनियां,कहां टिक पायेंगी
देवता के डर से,वे यहां न आयेंगी !
स्वदेशी का एक,नया दौर चला है
महंगाई के युग में,सस्ते से ही भला है !
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डॉ श्याम अटल
दाल में काला,कहीं और होगा
उम्मीद तो नहीं,यहां भी है धोखा !
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पतंजलि के सम्मुख,कोई न टिक रहा
बेचना भी चाहे तो,कुछ भी न बिक रहा !
विज्ञापनों की माया,ही कुछ ऐसी है
राम जी के अतिरिक्त,कोई ना दिखाई दे !
विदेशी कम्पनियां,कहां टिक पायेंगी
देवता के डर से,वे यहां न आयेंगी !
स्वदेशी का एक,नया दौर चला है
महंगाई के युग में,सस्ते से ही भला है !
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डॉ श्याम अटल
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