Tuesday, December 22, 2015

अटल मंथन
घर का भेदी,लंका ढहाये
कोई उसे,न समझा पाए !
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हिस्सा न मिले तो,गुस्सा आ जाता है
अपना ही आदमी,विद्रोह के गीत गाता है !
पदवी न मिले तो,बिफर जाता है
अपने ही दल को,पलीता लगाता है !
विनाश काले विपरीत बुद्धि,इस देश में खूब हो रहा
राजनीतिक गलियारों में,चर्चा का विषय बन गया !
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डॉ श्याम अटल 

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