अटल मंथन
समझने वाले,समझ गए
ना समझे वे,अनाड़ी हैं !
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कुछ विज्ञापन धड़ल्ले से,चल रहे हैं
मन्दी में भी कमाऊ पूत,बन गए हैं !
प्रचुर पैसे वाले कैसे,कुछ लोग बन गए ?
जो रात-दिन खटे उनके,नोट सारे छिन गए !
कुछ तो दाल में काला है,कैसे मोर्चा सम्भाला है ?
कुछ उद्योगपतियों का,वाकई में बोलबाला है !
मुट्ठी भर लोगों ने,नोट बन्दी से भी लाभ लिया
ईश्वर ही जाने कैसे,कमाई का हिसाब दिया !
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डॉ श्याम अटल
समझने वाले,समझ गए
ना समझे वे,अनाड़ी हैं !
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कुछ विज्ञापन धड़ल्ले से,चल रहे हैं
मन्दी में भी कमाऊ पूत,बन गए हैं !
प्रचुर पैसे वाले कैसे,कुछ लोग बन गए ?
जो रात-दिन खटे उनके,नोट सारे छिन गए !
कुछ तो दाल में काला है,कैसे मोर्चा सम्भाला है ?
कुछ उद्योगपतियों का,वाकई में बोलबाला है !
मुट्ठी भर लोगों ने,नोट बन्दी से भी लाभ लिया
ईश्वर ही जाने कैसे,कमाई का हिसाब दिया !
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डॉ श्याम अटल
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