अटल मंथन
बैंक बनी दुकान,जो कभी बन्द न होती
फिर भी धन की आपूर्ति,सम्पूर्ण नहीं होती !
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घर-घर की है,यही कहानी
नोट कहां से,लाये दानी ?
अब तो हो गए,सारे ज्ञानी
लिखने लगे हैं,नई कहानी !
जितने थे,समृद्ध अभिमानी
वे भी भरने,लगे हैं पानी !
जिसने भी है,बात न मानी
वह मुश्किल में,पड़ेगा जानी !
और अंत में,
छोटे नोट के,दिन फिरे हैं
मानो कह रहे,फिर मिलेंगे !
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डॉ श्याम अटल
बैंक बनी दुकान,जो कभी बन्द न होती
फिर भी धन की आपूर्ति,सम्पूर्ण नहीं होती !
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घर-घर की है,यही कहानी
नोट कहां से,लाये दानी ?
अब तो हो गए,सारे ज्ञानी
लिखने लगे हैं,नई कहानी !
जितने थे,समृद्ध अभिमानी
वे भी भरने,लगे हैं पानी !
जिसने भी है,बात न मानी
वह मुश्किल में,पड़ेगा जानी !
और अंत में,
छोटे नोट के,दिन फिरे हैं
मानो कह रहे,फिर मिलेंगे !
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डॉ श्याम अटल
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