Saturday, November 26, 2016

अटल मंथन
लुटेरे बैंक के इर्द-गिर्द,घात लगाए बैठे हैं
मौक़ा देखकर धन छीनकर,भाग लेते हैं !
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जिंदगी उधारी पर,चल रही है
आज की पेमेंट कल पर,टल रही है !
नोट तो हैं बैंक में,पर जेब खाली है
केश की दिक्कत से,अभी बदहाली है !
दो दिन बैंक का,अवकाश क्या रहा
जनजीवन देश में,थम सा गया !
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डॉ श्याम अटल

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