अटल मंथन
विचारणीय !
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छापामार तरीका ठीक न था,जनता को विश्वास में लेना था !
30 दिसम्बर तक नोट,चलन से बाहर कर देते
तब तक नए-पुराने दोनों ही,चलते रहते !
जनता को असुविधा न होती,बैंकों में भीड़ न लगती
हर हालत में करंसी,बैंक में जमा हो जाती !
बैंक में जमा होते ही,कर विभाग सक्रिय कर दिया जाता
जिसका जितना टैक्स बनता,ले लिया जाता !
सहज रूप से सब सम्भव था,पर ऐसा न किया गया
समूचे देश को लाइन में,खड़ा कर दिया !
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डॉ श्याम अटल
विचारणीय !
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छापामार तरीका ठीक न था,जनता को विश्वास में लेना था !
30 दिसम्बर तक नोट,चलन से बाहर कर देते
तब तक नए-पुराने दोनों ही,चलते रहते !
जनता को असुविधा न होती,बैंकों में भीड़ न लगती
हर हालत में करंसी,बैंक में जमा हो जाती !
बैंक में जमा होते ही,कर विभाग सक्रिय कर दिया जाता
जिसका जितना टैक्स बनता,ले लिया जाता !
सहज रूप से सब सम्भव था,पर ऐसा न किया गया
समूचे देश को लाइन में,खड़ा कर दिया !
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डॉ श्याम अटल
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