Wednesday, August 2, 2017

अटल मंथन
तूफानी पारी,चल रही है
कईंयों की जान,निकल रही है !
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एक मुर्गी सोने का,अंडा रोज देती है
और उसे सताओ,तो दम तोड़ देती है !
कईं नेता जैसे तैसे,छाप बचा रहे
पर उनकी ही साख पर,खतरे मंडरा रहे !
जीना दूभर हो रहा,इसमें शक नहीं
अति करने का,किसी को भी हक़ नहीं !
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डॉ श्याम अटल 

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