Saturday, May 16, 2015


अटल मंथन
कहीं मौसम की मार है,कहीं आतंक के वार हैं
जूझने के लिए,मानव बेबस लाचार है
घोर कलियुग का साक्षी,बन गया संसार ये !
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दैत्यों ने जिंदगी,नर्क बना दी है
सज्जनों को अकारण,ही सजा दी है !
न जीते न जीने देते,सुख-चैन दुनिया का हरते
आत्मघाती हथियार के जरिये,सबको मारते और मरते !
प्राकृतिक विपदाएँ भी,थमने का अब नाम न लें
भूकंपी तांडव रचाकर,सैकड़ों हजारों जानें लें !
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डॉ श्याम अटल

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