अटल मंथन
घर का भेदी,लंका ढहाए
जब जब उसके,जी में आए !
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चाहतों की खानापूर्ति,होती रहे
तो राजकाज आसानी से,चला करे !
भेदों का राजदार,कौन नहीं है ?
आप के पास आज,सबकी बही है !
आरोप-प्रत्यारोप,सदा चलते रहेंगे
निलंबन के वार,शिकायतकर्ता सहेंगे !
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डॉ श्याम अटल
घर का भेदी,लंका ढहाए
जब जब उसके,जी में आए !
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चाहतों की खानापूर्ति,होती रहे
तो राजकाज आसानी से,चला करे !
भेदों का राजदार,कौन नहीं है ?
आप के पास आज,सबकी बही है !
आरोप-प्रत्यारोप,सदा चलते रहेंगे
निलंबन के वार,शिकायतकर्ता सहेंगे !
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डॉ श्याम अटल
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