Tuesday, May 9, 2017

अटल मंथन
घर का भेदी,लंका ढहाए
जब जब उसके,जी में आए !
-----------------------------------------------------------
चाहतों की खानापूर्ति,होती रहे
तो राजकाज आसानी से,चला करे !
भेदों का राजदार,कौन नहीं है ?
आप के पास आज,सबकी बही है !
आरोप-प्रत्यारोप,सदा चलते रहेंगे
निलंबन के वार,शिकायतकर्ता सहेंगे !
----------------------------------------------------------
डॉ श्याम अटल

No comments:

Post a Comment