Friday, June 12, 2015

अटल मंथन
इंसान की अकल पर,तरस आता है
अपनी ही गल्तियों से,मारा जाता है !
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दुनिया विनाश की ओर,अग्रसर हो रही है
तबाही का कोई भी,अवसर न खो रही है !
दुर्घटनाएं रोजाना,कईं जानें लील जाती है
गंभीर मानवीय भूल का,प्रमाण बन जाती है !
घरेलू हिंसा भी,बढ़ती जा रही है
पारिवारिक संबंधों में,दरार आ रही है !
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डॉ श्याम अटल

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