*अटल वाणी - 586*
*सर्वत्र तू ही तू*
*नजर आता है*
*अटूट तुझसे ये*
*अपना नाता है !*
*************************
सारे रिश्ते-नाते हैं
भगवान से
हम सभी हैं
रूप भगवान के
अतः सभी से
हमें प्यार है
रूप-अरूप में
दर्शन तोहार है !
*************************
डॉ श्याम अटल
No comments:
Post a Comment