Tuesday, September 8, 2015

अटल मंथन
करे कोई , भरे कोई
अपराधी जबकि,हैं दोनों ही !
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बड़ों का भ्रष्टाचार,उजागर होने लगा है
रईस तबका अपनी,नींदें खोने लगा है !
धन-सम्पदा तो जाती ही है,मान भी जाता है
बदकिस्मत बंदा जेल की,हवा भी खाता है !
प्रायवेट और सरकारी का,तालमेल बिगड़ा
मिलीभगत का सौदा,पड़ता बहुत महंगा !
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डॉ श्याम अटल 

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